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शनिवार, 23 अगस्त 2025

आईएनएस तमाल ने ग्रीस की सौडा खाड़ी में बंदरगाह पर अपनी यात्रा पूरी की

Posted on Saturday 23rd August 2025 at 1:24 PM by PIB Delhi प्रविष्टि तिथि: 23 AUG 2025 at 1:24 PM by PIB Delhi

इस दौरे से समुद्री कूटनीति को बढ़ावा मिलेगा


नई दिल्ली: 23 अगस्त 2025: (पीआईबी दिल्ली//सात समंदर पार से)::

भारतीय नौसेना का आधुनिकतम और उन्नत तकनीकों से लैस युद्धपोत आईएनएस तमाल भारत में अपने घरेलू बंदरगाह के लिए आने के मार्ग में 19-22 अगस्त, 2025 को ग्रीस के सौडा खाड़ी में रुका। बंदरगाह पर आगमन के दौरान भारतीय जहाज के चालक दल ने हेलेनिक नौसेना और नाटो अधिकारियों के साथ बातचीत की। इसमें 19 अगस्त, 2025 को सौडा खाड़ी नौसेना बेस पर कमांडर कमोडोर डायोनिसियोस मंतादाकिस, नाटो समुद्री अवरोधन परिचालन प्रशिक्षण केंद्र (एनएमआईओटीसी) के प्रमुख कैप्टन कोप्लाकिस इलियास और अमरीकी नौसेना के नौसेना सहायता गतिविधि के कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन स्टीफन स्टीसी से कमांडिंग ऑफिसर की मुलाकात भी शामिल थी। बैठकों के दौरान चर्चा परिचालन संबंधी मामलों और समुद्री सहयोग पर केंद्रित रही। आईएनएस तमाल के चालक दल के लिए सौडा खाड़ी में इतालवी नौसेना के लैंडिंग हेलीकॉप्टर डॉक, बहु-भूमिका वाले हमले की इकाई आईटीएस ट्राइस्टे पर एक क्रॉस डेक दौरा आयोजित किया गया। 

ग्रीस में भारत के राजदूत रुद्रेन्द्र टंडन ने 20 अगस्त, 2025 को जहाज का दौरा किया और चालक दल के साथ बातचीत की। चालक दल ने युद्धपोत के बंदरगाह प्रवास के दौरान, सौडा नौसेना बेस और आयुध सुविधा, एनएमआईओटीसी और स्थानीय समुद्री संग्रहालय का दौरा किया। जहाज के चालक दल ने क्रेते में द्वितीय विश्व युद्ध के कब्रिस्तान में श्रद्धांजलि अर्पित की। 

आईएनएस तमाल 22 अगस्त, 2025 को सौडा खाड़ी से रवाना हुआ और उसने हेलेनिक नौसेना की रूसेन श्रेणी की गश्ती नौका एचएस रिटोस के साथ एक अभ्यास में भाग लिया, जिसका उद्देश्य नौसेनाओं के बीच आपसी सहभागिता को बढ़ावा देना था।

आईएनएस तमाल का बंदरगाह पर आगमन भारत द्वारा ग्रीस के साथ अपने संबंधों को दिए जाने वाले महत्व और दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग को सशक्त करने के प्रयासों को दर्शाता है। इसने दोनों नौसेनाओं को सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों को साझा करने और संयुक्त सहयोग के लिए आगे के अवसरों का लाभ उठाने का अवसर भी प्रदान किया है। 

भारत में अपने घरेलू बंदरगाह पहुंचने के रास्ते में यह युद्धपोत एशिया के मित्र देशों के बंदरगाहों का दौरा करेगा, जिससे समुद्री कूटनीति को बढ़ावा मिलेगा और सभी क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार होगा।

****//पीके/केसी/एनके//(रिलीज़ आईडी: 2160109)

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

एक यादगारी गीत--गुड़िया चाहे ना लाना पप्पा, जल्दी आ जाना.....!

Sunday 22nd April 2018 at 5:45 PM on Life, Jobs and Family Updated:23rd November 2024 

आज भी दुश्वार है पैसे के बिना ज़िंदगी....!


ज़िंदगी के रंग: 22 अप्रैल 2018: (मीडिया लिंक//सात समंदर पार से)::

"सात समंदर पार से....." इन शब्दों की यह पंक्ति जब सामने आती है तो बहुत से चेहरे सामने आने लगते हैं जिनको रोज़ रोटी  मजबूरी सात समंदर पार ले गई। कुछ कमाई कर के लौट आए..कुछ नाकाम हो कर लौट आए और कुछ कभी न लौट सके।   सन 1967 में आई फिल्म "तक़दीर" इसी तरह की कहानी पर  थी। यह फिल्म वास्तव में  एक कोंकणी फिल्म पर आधारित थी जो केवल एक बरस पहले सन 1966 में आई थी। यूं तो इसकी कहानी और इसके सभी गीत बहुत ही यादगारी रहे लेकिन परिवार  भावनाओं से जुड़ा एक बहुत ही खूबसूरत गीत था जिसके आरंभिक बोल थे:

सात समुंदर पार से गुड़ियों के बाज़ार से 

सात समुंदर पार से गुड़ियों के बाज़ार से

अच्छी सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना

पप्पा, जल्दी आ जाना, पप्पा, जल्दी आ जाना

यहाँ गीत का मुखड़ा फिर से रिपीट होता है....जिससे गीत का भावनात्मक बंधन और मज़बूत हो जाता है...!

सात समुंदर पार से गुड़ियों के बाज़ार से

अच्छी सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना

पप्पा, जल्दी आ जाना, पप्पा, जल्दी आ जाना

गीत के दुसरे अन्तरे तक आते आते गीत की धुन बदलती है..इसे आप संगीतकार का कमाल हैं। इस तबदीली से गीत और इसके संगीत का जादू और बढ़ जाता है। 

नई सुर और नई धुन में गीत की नई पंक्ति के बोल सामने आते हैं:

तुम परदेस गए जब से, बस ये हाल हुआ तब से

दिल दीवाना लगता है, घर वीराना लगता है

झिलमिल चांद सितारों ने, दरवाज़ों दीवारों ने

सबने पूछा है हम से कब जी छूटेगा ग़म से

इसके बाद ही अन्तरे की अगली पंक्ति में पुरानी धुन लौट आती है:

कब जी छूटेगा ग़म से, कब होगा उनका आना

पप्पा, जल्दी आ जाना, पप्पा, जल्दी आ जाना

यह गीत वास्तव में उन सभी परिवारों के आर्थिक संकट को भी सामने लाता है और भावनात्मक संकट को भी। आर्थिक मजबूरियां घर परिवार में पैदा होने वाले बिछोह के गम को भी बढ़ा देती हैं। फिर याद आती हैं एक और गीत की पंक्तियां--तेरो दो टकियां दी नौकरी मेरा लाखों  जाए--हाए हाए यह मजबूरी--यह मौसम और यह दूरी......! 

इस गीत में भी यही रेंग महसूस होता है इसके बाद वाले अन्तरे मैं। 

माँ भी लोरी नहीं गाती, हमको नींद नहीं आती

खेल खिलौने टूट गए, संगी साथी छूट गए

जेब हमारी खाली है और बसी दीवाली है

हम सबको ना तड़पाओ, अपने घर वापस आओ

अपने घर वापस आओ और कभी फिर ना जाना

पप्पा, जल्दी आ जाना, पप्पा, जल्दी आ जाना

गम, दर्द, उदासी और मजबूरियों का अनुमान लगाएं ज़रा इन शब्दों में:

ख़त ना समझो तार है ये, कागज़ नहीं है प्यार है ये

दूरी और इतनी दूरी, ऐसी भी क्या मजबूरी?

तुम कोई नादान नहीं, तुम इससे अनजान नहीं

इस जीवन के सपने हो, एक तुम ही तो अपने हो

एक तुम ही तो अपने हो, सारा जग है बेगाना

पप्पा, जल्दी आ जाना, पप्पा, जल्दी आ जाना

सात समुंदर पार से गुड़ियों के बाज़ार से

अच्छी सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना

पप्पा, जल्दी आ जाना, पप्पा, जल्दी आ जाना

पप्पा, जल्दी आ जाना.....

इन सभी  मजबूरियों  को सामने लाना ही है हमारा मकसद। आपके पास भी कोई सच्ची कहानी है तो ज़रूर भेजें।